समान रैंक समान पेंशन

क्या है समान रैंक समान पेंशन - समान रैंक समान पेंशन से तात्पर्य है कि एक रैंक पर कार्यरत सभी लोगों को एक समान पेशन मिले । पेशन में किसी तरह का भी अन्तर न हो । उदाहरण के तौर पर किसी विभाग मे सभी क्लर्क के पद से रिटार्यड होने वाले कर्मचारियों को एक समान पेंशन मिले ।
आखिर अन्तर क्यों होता है ? -
       पेंशन मे अन्तर आने का प्रमुख और एक मात्र कारण अलग अलग समय पर रिटार्यड होना । जैसे - मान लीजिए व्यक्ति किसी विभाग मे किसी पद पर कार्यरत है जिनकी रिटायरमेंट 1999 में रहती है जब  वह कार्यमुक्त होते हैं तब उनका वेतन ₹25500 उसी विभाग ने उसी पद पर कार्यरत किसी और व्यक्ति जिसका रिटायरमेंट 2003 में जब वह रिटायर्ड होता है तब उसका वेतन 30200 है अब जिसका वेतन 25500 है उसके पेंशन इसी वेतन के आधार पर रहेंगे और जिसका वेतन 30200 है उसकी पेंशन इस वेतन के आधार पर बनेंगे अब एक ही पद पर कार्यरत एक ही विभाग के दो कर्मचारियों के पेंशन में अंतर आ जाता है।
    चर्चा मे क्यो- पूर्व सैनिकों द्वारा सर्वप्रथम स्वतंत्र भारत में यह विवाद चर्चा में आया 1973 में सबसे लगभग 42 वर्षों तक यह विवाद चलता रहा कई सरकारें आई उन्होंने विभिन्न वादे किए लेकिन किसी ने अपने वादे को पूरा नहीं किया 2014 में बनी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में रक्षा मंत्री रहे श्री मनोहर पारिकर ने 5 सितंबर 2015 को पूर्व सैनिकों की यह मांग पूरी कर ली अब सैनिकों की मांग पूरी होने के बाद अन्य विभागों में भी एक रैंक एक पेंशन की मांग उठने लगी है ।
भारतीय सेना द्वारा समान रैंक समान पेंशन के लिए सर्वप्रथम 1973 में यह आंदोलन शुरु किया गया जिसकी पूर्ति नरेंद्र मोदी सरकार के रक्षा मंत्री श्री मनोहर पारिकर ने 5 सितंबर 2015 को लगभग 42 वर्ष बाद स्वीकार करके की समान रैंक समान पेंशन का यह संघर्ष का इतिहास केवल 40 सालों का नहीं है अगर इतिहास में जाया जाए तो यह बहुत पुराना है 1857 की क्रांति का प्रमुख कारण में से एक समान रैंक समान वेतन था क्योंकि उसी रैंक पर मौजूद अंग्रेजी सैनिकों को जाता वेतन दिया जाता था जबकि भारतीय सैनिकों को कम वेतन दिया जाता था जिससे सेना में असंतोष था अगर थोड़ा और पीछे जाएं तो हम देखते हैं मुगल साम्राज्य के पतन में एक प्रमुख कारण जमीदारी संकट था इस जमीदारी संकट की उत्पत्ति औरंगजेब या उससे पहले के जो मुगल शासक थे उनके सैनिक तथा सैनिकों के अधिकारी को कुछ को वेतन और कुछ को जमीन दी जाती थी औरंगजेब के समय तक सेना में भारी वृद्धि करनी पड़ी जिससे कुछ जमीदारों को सैनिक अधिकारियों को अधिक जमीन मिली और कुछ को कम जिनकी आय कम थी वह असंतुष्ट हो गए तथा अंदर खाने से औरंगजेब के खिलाफ साजिश करने लगे उसके बाद भारत के शासन में धीरे धीरे परिवर्तन होता है और अंग्रेजों का अधिकार होता है अंग्रेज प्रारंभ में व्यापारी थे लेकिन बाद में जब भारत के शासक बने तो वह भी सैनिकों के साथ दोहरा रवैया अपनाया इतना ही नहीं सैनिकों की कई स्तर भी बना दी नियमित सैनिक और जरूरत पड़ने पर सैनिक तथा भारतीय सैनिक व अंग्रेजी सैनिक भारतीयों को काम ज्यादा लिया जाता था वेतन कम दिया जाता था इसलिए भारतीय सेना में आक्रोश था जो 18 57 की क्रांति में एक कारण था सैनिकों की या शिकायत लगातार बनी गई जिसे आजाद भारत में समान वेतन देकर समान रैंक के लिए पूरा किया गया लेकिन 1973 में एक नई समस्या का जन्म हो गया समान रैंक के लिए समान पेंशन की मांग उठने लगी यह मांग जायज है हालांकि सरकार पर लगभग 10 हजार करोड़ अतिरिक्त खर्च होने का अनुमान है फिर भी अगर देखा जाए तो अन्य सरकारी नौकरियों और सैन्य नौकरियों में काफी ज्यादा फर्क होता है सेना में रिटायरमेंट की उम्र काफी कम होती है इसलिए वेतन वृद्धि का लाभ उनको नहीं मिल पाता उसी रैंक पर जो पहले रिटायर्ड होता था उसकी पेंशन कम तथा जो बाद में रिटायर्ड होता था उसकी पेंशन ज्यादा होती थी हलाकि एक रैंक एक पेंशन की मांग अन्य विभागों द्वारा भी की जा रही है लेकिन सैन्य विभागों के संदर्भ में उनकी मांग ज्यादा उचित नहीं है क्योंकि सेना को छोड़कर अन्य सभी विभाग में रिटायरमेंट की उम्र 60 वर्ष या उससे अधिक है अतः एक कर्मचारी को अपने कार्य के दौरान 3 से 4 वेतन आयोगों का लाभ मिल जाता है जबकि सैनिक कर्मचारी को सैन्य कर्मचारी को एक या दो वेतन आयोग का ही लाभ मिल पाता है अन्य अन्य अन्य सरकारी नौकरियों में सुरक्षा ज्यादा होती है जब की सेना में हमेशा खतरा बना रहता है परिवार के पालन पोषण के लिए सैनिकों के वेतन में वृद्धि करने की मांग हमेशा उठती रहती है अन्य अनेक कारणों से भी सेना की मांग ज्यादा उचित है ।
सरकान ने पूर्व सैनिकों की यह मांग पूरी कर ली लेकिन उसने अपनी कुछ शर्तें भी रखी हैं सरकार ने पूर्व सैनिकों को एक समान पेंशन जुलाई 2014 से जॉब कर देने की बात की तथा एरियर की किस्त 4 किस्तों में दिया जाएगा पेंशन रिविजन की अवधि 5 वर्ष की सरकार ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने वाले सैनिकों को बाहर रखा तथा उनके लिए एक कमेटी का गठन किया कमेटी के सुझाव के बाद उनको शामिल करने की प्रक्रिया चल रही है सैनिकों की विधवा को एकमुश्त रकम देने की बात की गई इस योजना से सरकार पर तत्काल में 10000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ आया। अब एक पद से रिटार्यड होने वाले सभी सैनिकों की पेंशन.एक समान होगी ।
     अतः सरकार द्वारा यह मांग पूरी कर लिये जाने के बाद सैनिको का पिछले 42 वर्षों का संघर्ष सफल रहा अब इसी को आधार बनाकर अन्य विभाग भी मांग कर रहे है लेकिन उनका कोई संगठित आन्दोलन अभी तक सामने नही आया.है ।
  

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