बेरोजगारी की हसी - लेखक - प्रलय शास्त्री
बेरोजगारी की हसी -
बिरजू अपने गाँव पढ़ाई के वास्ते इलाहाबाद गवा अरे उहय विरजू अपने रमई काका का बेटा , अब काका खुदौ सरकारी नौकरी करत रहेन औ दूनऊ बड़के बेटये नौकरी करत रहेन खेती बारी भी खूब रही दाल चावल गेहूँ कुछु खरीदई के नाय परत रहा ,रमई काका गाँव म काफी सम्पन्न रहेन औ उनकर लरिका बिरजू पढ़ई लिखई मे अव्वल दर्जा के रहा । बिरजू जब बराहवीं पास करेस तौ काका वोका इलाहाबाद म भेज देहेन पढ़ई के खातिर धीरे धीरे समय बीतत गवा बिरजू एम.ए , बी.एड. औ टी ई टी पास कई लेहेस लिकिन अबे ऊ तैयारी करत बाटै सिबिल का । कईयव सरकार आयीं चली गयी लिकिन केऊ ई ध्यान नाई देहेश कि पढ़ा लिखा बेरोजगार नाही रह जाये । अरे आपन बिरजू ऐसो खुदै रेलवे मे ग्रुप डी , इण्टर कालिज मे चपरासी का फारम डाले बाटै , ऐसौ उ गया रहा मास्टरी खातिर साक्षातकार देवै लिकिन नाए भईल ऐ भैया आपन बिरजूआ पी एच डी हवै और जो परीक्षवा लेत रहेन वो एम ए बी. एड. रहेन बस ।
एक दिना बिरजू कुर्सी पे बेठकर पढ़त रहेन ऐतने मा घरे से फोन आई गवा बिरजू के फोन उठैबतै रमई काका बोलेन-
रमई काका - बच्चा कइसन बाटे
बिरजू - बाबू पायलागी.
ठीक बाटी
काका- 3-5 तारीख मे ए टी एम से 6000 निकाल लिहा ।
बिरजू- ठीक बा
काका - रखत बाटी
बिरजू - ठीक बा बाबू
पायलागी
फोन त कट गवा लिकिन बिरजू के मन मे अबही भूचाल उठत बाटै ,
आवौ तनी देखी त बिरजू के मन म का चलत बा ,,,
बाबू जी के फोन आये से माथे क चिन्ता थोड़ी कम जरूर भईल लिकिन अबे तमाम चिन्ता दबाये बाटै अब बिरजू के दिमाग मे पूरे महीने का बजट का सारा पहलू आवत वाटै , विरजू सोचत ह्वै कि चला हम 3 तारीखे के 6000 रूपया निकाल लेब ए. टी. एम से फिर महीना भर का खर्च का हिसाब लगावत वाटै .......
3000 रूपया 5 तारीख का कमरा के भाड़ा दै देब फिर बचा हमरे लगे 3000 हजार रूपया जेहमे से अबकी महीना मे किताब हम केवल 700 रूपया के लेबै लेकिन फिर सोचत बा मन मे अरे ऊ इतिहास वाली किताब और टी.जी.टी वाली संस्कृत के किताब हम पिछले महीना भी अगले माहीना तक के लिऐ टाल लिये रहे काहें से पिछले महीना हम कुल 2500 के किताब खरीदे रहे बाबू जी से कुल 7000 रूपया लीन रहे महीना भरे का और अगर हम संस्कृत और इतिहास वाली किताब लेत बाटी त हमार किताब मे ही 1700-1800 रूपया खर्च हो जाऐ फिर बचे हमरे लगे 1200 रूपया फिर एकाएक बिरजू के मन उनके दिल्ली वाले भईया देवता बन के याद आय जात थेन बिरजू सोचत बा मन अगर भईया 2500-3000 रूपया दै देत वाटेन त हमार सब कुछ बहुत अच्छे से होई जाए और सारी दिक्कत ऐह महीना वाली खतम होई जाऐ लेकिन फिर बीरजू के मन आवत है कि भईया हर महीना 20000 रूपया घरे भेज देत है और दिल्ली में रहत है उनके मेहरारू लडि़का और उनकर भी कुछ खर्चा त उनसे हम कैसे बोली ई सही बात है कि जौ हम बोलब त भईया न , न बोलिहै लिकिन कुछ हमहू के त सोचै के चाही , अब बिरजू फिर से सारी उम्मीद छोड़ कै अपने लगे के 6000 हजार रूपया और खर्च के हिसाब लगावै बैठ गा , अपने मन मे सोचत बा बिरजू और आपन पर्स निकालेस अबे जेतनी रूपिया रही गिनेस त ओकरे लगे कुल 476 रूपिया निकली अब बिरजू हिसाब लगावत बा ,कि अब हमरे लगे कुल रूपिया 6476 बा जेहमे से 3000 किराया , 100 रूपिया सफाई के , औ 1800 रूपिया किताब के , 120 रुपिया पेपर के , महीना भरे का मर मसाला नमक तेल चीनी चायपत्ती कुल जोड़ ल 500 रुपिया , महीना भरे का सब्जी के लै ला 600 रूपिया और कुछ खर्च लै ल 500 रूपिया अब तनी देखी तव केतना खर्च भा अब जब जोड़त बा बिरजू त मूड़ेप हाथ धै लेहेस कुल खर्च आवत बा 7620 रूपिया और ओकरे लगे बा 6476 रूपिया , अब बिरजू अपने खर्च से कटौती कर बा त सबसे पहले ऊ आपन अतिरिक्त खर्च जौन 500 रहा वोका 200 तक सीमित करै के सोच लेहेस और सब्जी खर्च जौन 600 रहा बोका 300 तक लावा के इरादा कई लेहेस और अपने मन म कहेस कि बाजार के सबसे सस्ती सब्जी लाय के खाब नाहित दाल चावल रोटी खाब सब्जी हटाईन देब बिरजू मर मसाला चीनी चायपत्ती के खर्च 500 रूपया जोड़े रहा जेहमे ऊ चीनी चायपत्ती एकदम खतम कई देहेस मसाला तेल भी कम कई के उ खर्च 200 रूपिया निर्धारित कई देहेस औ अपने मन मे बोला चाय पिये से सेहत खराब होत थै ई कौनऊ फायदा कै चीज थौरो आ , अब बिरजू सोचा मन कि नेट और रात 8:45 वाले समाचार से सारी खबर मिलिन जात बा त पेपत फालतू मे लगवाये अही अब से पेपर बन्द ओकर 120 रुपया बचा अब कुल रूपया बचा 1020 रूपया अब 7629 मे से 1020 रूपया घटाये पै 6609 रूपया लिकिन बिरजू के लगे रहा केवल 6476 रूपया अबेउ 133 रूपया ज्यादा लागत रहा अब कटौती करय के कौनउ जगह नाए बची रही ऐतने में बिरजू का ध्यान कमरा रखे पुराने पेपर पै पड़ी जेका बिरजू अपुना खातिर एक ठू शर्ट खरीदई बिदा बटोरे रहा सोचत रहा कि अगर ई 400-500 रूपया के होई जाऐ त बेच के एक ठी शर्ट लै लेब लिकिन अबे पेपर मुश्किल से 150-200 रूपया के एकठ्ठा भै रहा अब बिरजू सुबह होए के इन्तजाथ करई लाग होत भिनऊखा बिरजू कबाड़ वाले के बोलाऐस औ सारा रद्दी पेपर बेच देहेस जौन कुल मिलाकर157 रूपया के भै अब बिरजू ओठ पै फिर से हल्की से मुस्कान आए गई की चला अब हमरे लगे ऐह महीना के खर्च से 24 रूपया ज्यादा बा लेकिन थोरिकै देर मे बिरजू फिर से उदास होई गा जब वोका आई.ए.प्री के रिजल्ट के याद आई गा ऊ सोचई लाग कि हमार जून मे 18 तारीख के इन्तहान रहा औ घरे मई म बड़के भैया के विबाह रहन त हमका अप्रैल से घरे वोलाई लेहेन सब औ 10 जून तक तेली के बरधा के नाई खटाऐन त रिजल्ट अपुनई पता चल गा इ तव हम ध्यान से काम लीन और पेपर नाई दीन काहे से एक मौका बेकार केहे कौनव फायदा नाए रहा , लिकीन अब भई पूछिहें का भा त ओनका अऊ बाबू के हम काऊ जबाब देब , ऐतन मे फोन के घण्टी बजी घरे से फोन बाबू - अम्मा सबसे बिरजू खूब हस हस के बतलात रहा जैसेन बिरजू बहुतई खुशी होई , अगले दिन सबेरे बिरजू लगे रमई काका अरू बिरजू के बाबू फिर से फोन केहेन उहई 10;30 - 11 बजे औऊ हस के बोलेन बेटवा ऐसऊ तोहरउ विबाह मान लीन अप्रैल मई मे क ई देब अब बिरजू दिखावै खातिर हसी देहेन लिकिन अन्दर से बिरजू रोए देहेन औ सौचै लागेन अबे हम आपन खर्चा नाए चलाई पावत बाटी एक जनी आए जैहें तौ एनकर कैसे चलाऊब अब बिरजू के लगे दूनऊ भैया के दीदी कै गाँव वाले चच्चा के बड़के भतीजे कै सब कर फोन आए गा सब बिरजू के सब बधाई देवै लागेन बिरजू सब से हस हस के बतलानेन लेकिन अन्दर अन्दर खुब रोयेन , अब बिरजू सोचै लागेन कि बाबू बोलेन हा कि सितम्बर म लड़की देखै बा औ एन्गेजमेन्ट बा त ओहमे हमका एक पैन्ट शर्ट मिल जाऐ ओकरी बाद जनवरी मे वरीक्षा बा त एक सेट वोहमे मिल बाकी शादी मे त सब लै कै आबई.करीहें बिरजू मनई मन.सोचत बाटेन कि बाबू औ बड़की दीदी कपड़ा खातिर पैसा दीन रही त हम वोकर किताब लै लीन हा लिकिन.अब कौनउ टेन्सन नाए बा काल सबेरेन आपन रद्दी और पुरान काफी कागज बेच देब और जौन पैसा मिले वोकर हम एल. लक्ष्मीकान्त वाली संविधान के किताब लै लेब और 24 सितम्बर के होए वाले पी सी एस के परीक्षा पूरी मेहनत से देब ताकी अबकी होई जाए औ होऐ काहे न अबकी सरकार बदली बा औ पेपर आऊट और धाधलेबाजी दूनौ न होऐ और जौ ईमानदारी से परीक्षा भई त हमार कन्फर्म होई जाऐ , इतह बात सोच कै बिरजू के ओठन पै फिर से मुस्कान आए गई । बिरजू अन्दर अन्दर केतनौ परेशान रहै लिकिन कबहूँ किहू के कुछ पता नाए चलत देहेश , ऊ हमेशा सब से मुसकाए के मिला थई । अब बिरजू अपने आवश्यकता और चीज के खातिर धैर्य के साथ हर महीना बचै वाले एक एक पैसा का इकठ्ठा करै के खातिर गुल्लक बनाई लेहेस .।
आखिर यही तो है बेरोजगारी की हसी ।.।।।।।।।
लेखक - प्रलय शास्त्री
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