संसद में माँब लिंचिंग
अभी हाल मे समाप्त हुऐ संसद का मानसून सत्र कयी मामलों में काफी महत्वपूर्ण रहा इस सत्र मे भारत को नया राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति मिला तो कई बहुप्रतीक्षित मुद्दों पर संसद मे बहस भी हुई , संसद में जहाँ विदेशमंत्री श्रीमती स्वाराज ने भारतीय विदेशनीति पर सरकार का पक्ष रखा वही वित्तमंत्री ने आर्थिक सर्वेक्षण का दूसरा भाग प्रस्तुत किया इस सत्र मे लगभग 20 विधेयकों पर चर्चा हुई जिसमें कुछ पास भी किऐ गऐ , संसद का कुल 30 घंटे का समय विवाद व ववाल की बलि चढ़ा तो वहीं 10 घंटे का अतिरिक्त समय लेकर भी चर्चा हुई ।
इन तमाम चर्चाओं के मध्य मेरी दृष्टि सहसा एक विशेष शब्द और उस पर हुऐ बहस पर ठहर गई अंग्रेजी का यह शब्द हिन्दी मे सुनने मे किसी स्वादिष्ट चायनीज डिश जैसा लगता है - माँब लिंचिंग
माँब लिंचिंग का शाब्दिक अर्थ होता है हिन्दी भाषा मे भीड़ द्वारा हिंसा , इस आकर्षक से दिगने वाले मुद्दे पर लोकसभा मे चर्चा की शुरूआत करते हुऐ सदन मे कांग्रेश नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि भारत मे इस समय घोर असहिष्णुता व्याप्त है इस समय भारतीय समाज मे भय हिंसा और असुरक्षा का माहौल है , भाई साहब मै अपनी घुटकी की कसम खाकर कहता हूँ कि इतना सुनते ही मै एकदम डर गया कि आज हमारा देश किस स्थिति से गुजर रहा है और मै बेखौफ हूँ मुझ इन सब का कुछ एहसास ही नही है आखिर क्यों मै अब भी सुबह के 4 बजे IERT ground से होकर ट्रेन पकड़ने जाता हूँ अगर खडगे जी सही है तो क्या होगा , फिर अगले ही पल मै जैसे उनके भाषण का अगला अंश सुना तो चकित रह गया उन्होने कहा हमारा अल्टसंख्यक समुदाय बहुत ही असुरक्षित और भय मे है वो इस माँब लिंचिंग का शिकार हो रहा है वो डर डर के जी रहा है , जनाब फिर तो मुझे साप सूंघ गया मै तो सोचने लगा कि पंजाब की हालात बहुत बुरी होगी क्योकि सिख अल्पसंख्यक है , साथ ही जैन बौद्ध पारसी ईसाई और अल्पसंख्यकों मे सबसे बड़ा जन समुदाय मुस्लिम इनकी क्या हालत होगी , परन्तु खडगे जी हमारी चिन्ता को विराम देते हुऐ तथा अपने लय मे आते हुऐ बोले दादरी आयूब पंडित , जुनैद खान , जफर हुसैन , जाहिद रसूल भट्ट का उदाहरण दे डाले फिर मुझे समझते देर नही लगी कि इन जनाब की वास्तविक चिन्ता माँब लिंचिंग नही है वरन इनका और इनकी पार्टी वोटबैंक वाला विशुद्ध राजनीतिक ऐजेंडा है , मै इस क्रम मे लोकसभा और राज्यसभा के कई नेताओं का सदन मे वक्तव्य सुना जिनमे प्रमुख गुलाम नबी आजाद , सीतारामयेचुरी , ओवैसी, मुलायम सिंह यादव लगभग लगभग सभी राजनीतिक दलों के नेताओं ने इन नामों कोई बृद्धि नही की , मुझे लगने लगा माँब लिंचिंग का मतलब होता मुस्लिम समुदाय पर की गयी हिंसा ।
यहाँ मै एक चीज स्पष्ट करना उचित समझता हूँ ताकि किसी के मन में कोई संदेह न रहे मै वास्तविक रूप से धर्मनिरपेक्ष हूँ , तथाकथित नही और मुझे राष्ट्र की चिन्ता है वोट की नही , मेरे पास धर्मनिरपेक्षता का कोई भी किसी भी राजनीतिक दल द्वारा प्रदत्त कोई प्रमाणपत्र भी नही है और न ही मुझे उसकी कोई आवश्यकता ही है ।
अब मै अपने मुद्दे पर वापस आता हूँ ,अब चर्चा मे अगला नाम जो संसद में इस मुद्दे पर बहस मे भाग लिया वो सत्ताधारी दल की तरफ से हुकुमदेव नरायण यादव जी थे बिहार से भाजपा के लोकसभा सांसद है , अभी तक मै ऐ नही समक्ष पाया था कि संसद पर चर्चा माँब लिचिंग पर हो रही है या इसके नाम पर एक खास समुदाय पर लेकिन हुकुमदेव नरायण यादव ने इस बात को स्पष्ट करते हुऐ कहा कि - लोकसभा अध्यक्ष महोदया क्या कश्मीर में पथ्थरबाजी माँब लिंचिंग नही है बंगाल में जो हुआ वो माँब लिंचिंग नही है या फिर पिछले दिनों केरला में भीड़ द्वारा अलग अलग घटनाओं मे 17 आर. एस.एस. कार्यकर्ताओं की हत्या माँब लिंचिंग नही है , । यह वक्तव्य सुनने के बाद मुझे लगा ही संसद मे अब जाकर माँब लिंचिंग से जुड़े तथ्य अर्थत सम्पूर्ण मुद्दा सदन की पटल पर आया , साथ ही आश्चर्य हुआ कि जो काम विपक्ष को करना चाहिऐ वो काम सत्ता पक्ष का एक वरिष्ठ नेता कर रहा है , क्या विपक्ष अब केवल हो हल्ला करने सदन की कार्यवाही बाधित करने और एक विशेष वोटबैंक राजनीति के लिऐ ही है , क्या विपक्ष अब इतना कमजोर हो गया है कि वह सदन मे पक्ष पर ठीक से आरोप भी नही लगा सकता , क्या विपक्ष को कश्मीर की पथ्थरबाजी , बंगाल के दंगे और हत्या , केरला व कर्नाटक की हत्या नही दिखी , क्या विपक्ष इतना हतास निराश है कि वह किसी भी मुद्दे के सभी पहलू को सदन के पटल पर रख भी नही सकता है , या फिर किसी वोटबैंक रूपी राजनीतिक मजबूरी से बधा हुआ है ।
मै विपक्ष की इस मजबूरी पर विचार किया अगर मै खडगे जी की जगह होता तो सदन मे मेरे वक्तव्य मे भारत के सभी 29 राज्य 7 केन्द्रशासित राज्य यहाँ तक की द्वीप , घाटी पर्वत कुछ भी नही छोड़ता कही भी किसी भी समुदाय जाति धर्म , सम्प्रदाय ,दल , राजनीतिक विचारधार सभी घटनाओं को उठाकर सदन के पटल पर रख देता और फिर देखता की सत्तापक्ष वक्ता हुकुमनरायण यादव जी किस लहजे में बोलते है , क्या अब भी उनकी शैली फटकार वाली होती है , क्या अब भी वे माँब लिंचिंग को सदन मे परिभाषित करते , नही शायद कभी नही क्योंकि अब वो इस मुद्दे से भागते दिखते क्योंकि उनके पास विपक्ष को पटकारने का कोई तथ्य नही होता लेकिन दुर्भाग्य हमारा आधा अधूरा विपक्ष वोटबैंक की मजबूरी मे खुद के अस्तित्व तक को भुला चुका है ।
मै सुना करता था कि जब पं. जवाहरलाल नेहरू जी प्रधानमंत्री थे तब किसी मुद्दे पर बहस के लिऐ सत्ता पक्ष का ही कोई सांसद विपक्ष बनकर मुद्दे को सदन मे उठाता था क्योंकि उस समय विपक्ष नही था , लेकिन वर्तमान मे विपक्ष एकदम लाचार तथा वोटबैंक की लालच से बधा हुआ है वह कोई मुद्दा उठाता भी है तो केवल आधा अधूरा एकपक्षीय । वह एक वर्ग विशेष को नाराज नही करना चाहता इसलिऐ सरकार को घेरने का बड़ा अवसर हाथ से गवाँ देता है ।
सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो तब दिखता है जब सत्ता पक्ष का सांसद सरकार से पूछता है कि आखिर कश्मीरी अलगाववादियों पर अब तक कोई कार्यवाही क्यों नही की गयी और विपक्ष इस मुद्दे पर एकदम शानत बैठा रहता है , क्योंकि उसका एक प्रमुख नेता खुले मंच से कन्हैया कुमार , उमर खालिद जैसे अफजल गुरु और याकूब मेनन के समर्थकों का समर्थन करता है जो अभिव्यक्ति आजादी के नाम पर नक्सल वादी , कश्मीरी अलगाववादी , आतंकवादी का समर्थन तथा देश की सेना को गाली देने वाले कन्हैया कुमार को देश की युवा पीढ़ी का भविष्य बताते है , तो फिर विपक्ष किस मुह से सरकार को राष्ट्रहित के मुद्दे पर घेराबन्दी करे ।
शायद मेरे हिसाब से सबसे बड़ी माँब लिंचिंग तो संसद भवन मे है ।।।।
जय हिन्द
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